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पूर्व मुखी घर का वास्तु

कैसे अपने पूर्व मुखी निवास स्थान को वास्तु नियमों के अनुसार बनाये

यदि आपने हाल ही में एक पूर्व मुखी भूमि को खरीदा है तो आप बधाई के पात्र है। पूर्व दिशा को उत्तर के बाद सबसे शुभ दिशा के रूप में माना जाता है और इसलिए वास्तु अनुसार यह भूमि बहुत अच्छी मानी जाती है। यदि आप का झुकाव अध्यामिकता की ओर है और आप सोच रहे है कि कैसे अपने घर एवं उसके आस-पास सकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव बढ़ाया जाए तो पूर्व मुखी भूमि आपको यह विकल्प प्रदान करती है। निम्नलिखित लेख में आपको इस सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त होगी-

वास्तु सिद्धान्तों के अनुसार घर को व्यवस्थित करने सम्बन्धी नियमों पर चर्चा शुरू करने से पूर्व हमें समझना चाहिए कि वास्तु शास्त्र क्या है और इसका सम्बन्ध हमारे जीवन से कैसे है।

मोटे तौर पर, वास्तुशास्त्र एक प्राचीन भारतीय विज्ञान है जो घर की वास्तुकला का अध्ययन करता है एवं प्राकृतिक वातावरण के साथ मानव निर्मित संरचनाओं को एकीकृत करने सम्बन्धी नियमों का प्रतिपादन करता है।

वास्तु विशेषज्ञों के अनुसार घर में सकारात्मक ऊर्जा तभी प्रचुर मात्रा में होती है जब कि मनुष्य और प्रकृति का सम्बन्ध तारतम्य पूर्ण होता है। सकारात्मक ऊर्जा ही किसी घर एवं व्यक्ति के जीवन में सुख एवं समृद्धि को लाती है। इस प्रकार वास्तुशास्त्र को चीनी फेंगशुई के समकक्ष समझा जा सकता है। वास्तु सिद्धान्तों का निर्माण विभिन्न प्रकार की अध्यात्मिक एवं वैज्ञानिक विचारो के आधार पर किया गया है। उदाहरण के लिए एक पूर्व मुखी घर को अत्यन्त शुभ माना जाता है क्योंकि सूर्य जो कि प्रकाश और समृद्धि का प्रतीक है, पूर्व दिशा में उगता है और अपने साथ प्रकाश एवं सकारात्मक ऊर्जा को लाता है। इस प्रकार पूर्व मुखी घर अधिकतम सौर ऊर्जा का उपयोग करने में सक्षम होते है जिससे घर में सकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव अधिक होता है। फिर भी यह आम धारणा कि पूर्व मुखी हमेशा शुभ ही होगा, पूर्णता सत्य नहीं है। घर के अन्दर कमरों की व्यवस्था, प्रवेश द्वार की स्थिति इत्यादि ये सभी कारक घर की शुभता का निर्धारण में अपना एक अलग महत्व रखते है अतः इन्हें भी वास्तु नियमों के अनुसार होना चाहिए।

वास्तु शास्त्र के अन्तर्गत यह सुझाव दिया जाता है कि मकान के पूर्वी खण्ड को जितना सम्भव हो सके खुला रखना चाहिए जिससे कि अधिकतम सूर्य का प्रकाश घर में प्रवेश कर सके। कोशिश करें कि घर के पूर्व दिशा के सामने कोई बड़ा पेड़ इत्यादि नहीं होना चाहिए क्योंकि यह सूर्य की रोशनी को बाधित करता है। इसके अलावा, घर के उत्तर अथवा उत्तर-पूर्वी हिस्से में कभी भी कूड़ेदान या शौचालय स्थापित नहीं करें क्योंकि यह नकारात्मक ऊर्जा के मुख्य स्रोत हैं।

वास्तुशास्त्र के अंतर्गत घर के प्रवेश द्वार को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। पूर्व मुखी घर में, मुख्य द्वार को पूर्व दीवार के मध्य से लेकर उत्तर पूर्वी हिस्से तक कही भी बनाया जा सकता है। उत्तर पूर्व दिशा पूजा घर एवं बैठक कक्ष के लिए आदर्श मानी जाती है क्योंकि सुबह यही पर सबसे पहले सूर्य की किरणें पड़ती है। अगर इस स्थान में एक भूमि-गत पानी की टंकी है तो यह उस घर के लिए शुभ माना जाता है।

एक पूर्व मुखी घर का निर्माण करते समय हमेशा यह तथ्य ध्यान में रख जाना चाहिए कि पूर्वी हिस्सा घर के अन्य स्थानों की तुलना में ऊँचा न हो। वास्तुशास्त्र के अंतर्गत एक घर में जिसका ढलान दक्षिण से उत्तर दिशा की ओर है, अत्यंत शुभ माना जाता है, लेकिन कुछ अपवाद जनक परिस्थितियों के अंतर्गत दक्षिण पश्चिम से उत्तर पूर्व दिशा की ओर ढलान भी स्वीकार है। वास्तु के अंतर्गत, दक्षिण पश्चिमी दिशा की तुलना में उत्तरी और पूर्वी दीवारों की ऊंचाई का कुछ कम होना अच्छा माना जाता है। गेस्ट रूम के लिए सबसे अच्छा स्थान उत्तर पश्चिम दिशा माना जाता है। मास्टर बेडरूम दक्षिण पश्चिम दिशा स्थापित किया जाना चाहिए। रसोई घर के सर्वश्रेष्ठ स्थान दक्षिण पूर्व दिशा है विकल्प के रूप में इसे उत्तर पश्चिम दिशा में भी स्थापित किया जा सकता है। सीढ़ियां भी इसी दिशा में स्थापित की जा सकती है।

उपर्युक्त तरीकों से अपने पूर्व मुखी निवास स्थान की वास्तु विनियम करने से आप इसे बहुत ही शुभ बना सकते है एवं परिणाम स्वरूप सकारात्मक ऊर्जा का अधिकतम प्रभाव अपने जीवन में ला सकते है। इसके अलावा, कई व्यक्ति वास्तु यंत्रों का प्रयोग करते है जिन्हें दुर्भाग्य से बचने का महत्वपूर्ण एवं शक्तिशाली साधन माना जाता है। इस प्रकार इन वास्तु नियमों का पालन करके हम अपने जीवन को खुशहाल बना सकते है।

Vastu for East Facing House