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उत्तर मुखी भवन का वास्तु

कैसे अपने उत्तर मुखी निवास स्थान को वास्तु अनुसार बनाये?

अधिकांशतः लोग उत्तर मुखी घर को खरीदना पसन्द करते है, क्योंकि यह आम धारणा है कि उत्तर मुखी घर हमेशा अच्छा, धन दायी एवं अत्यधिक शुभ होता है। लेकिन यह तथ्य पूर्ण रूप से सही नहीं है, कई ऐसे मामले पाये गये है जहां उत्तर मुखी घर में भी अशुभता एवं नकरात्मकता पायी गयी है। क्योंकि वहां वास्तुशास्त्र मूलभूत सिद्धान्तों का पालन नहीं किया गया था। इसके अलावा, वास्तुशास्त्र में ऐसा कोई नियम नहीं है कि मकान उत्तर मुखी ही होना चाहिए।

सरल शब्दों में, घर की शुभता वास्तव में उसके अभिविन्यास एवं दिशा से सम्बधित नहीं है बल्कि इस पर अन्य कई कारकों का भी अत्यन्त प्रभाव पड़ता है। घर के प्रवेश द्वार को स्थापित करते समय अन्य कमरों की स्थापना संबंधित वास्तु नियमों का भी ध्यान किया जाना चाहिए।

उत्तर मुखी घर में वास्तु अनुसार मुख्य द्वार की स्थापना :
यद्यपि अधिकांश लोग उत्तर दिशा को घर के निर्माण के लिए सबसे अनूकूल मानते है। लेकिन वास्तुशास्त्र के नियमानुसार कोई भी किसी भी मुखी घर के प्रवेश द्वार को उत्तर दिशा में स्थापित कर सकता है। और यह घर में शुभ वातावरण का निर्माण करेगा। हालांकि वास्तुशास्त्र से जुड़े मूलभूत तथ्यों के अनुसार, उत्तर दिशा में 9 पद माने जाते है एवं प्रत्येक पद का अपना एक अलग महत्व एवं शुभता है।
यदि आप अपने धर में समृद्धि पूर्ण वातावरण स्थापित करना चाहते है तो उत्तर दिशा का पाँचवां पद प्रवेश द्वार के लिए सबसे उपयुक्त है। उदाहरण के लिए यदि आपका घर 27 फुट चौड़ा है और यह उत्तर मुखी है तो प्रत्येक पद 3-3 फीट का होगा आप पूर्व दिशा से 15 फुट से लेकर 18 फुट तक उत्तर मुखी प्रवेश द्वार का निर्माण कर सकते हैं जो कि अत्यन्त ही शुभ होगा।

उत्तर दिशा के सभी पदो के बारे कुछ आवश्यक तथ्य निम्नलिखित है :

• उत्तर मुखी घर के मुख्य द्वार को स्थापित करने के लिए उत्तर दिशा का पांचवा पद सबसे शुभ माना जाता है। भारतीय परम्परा के अनुसार यह धन-समृद्धि के अधिपति भगवान कुबेर का स्थान है एवं इसे स्वाभाविक रूप से घन को आकर्षित करने वाला भाग माना जाता है।
• यदि उत्तर दिशा में 5वां पद मुख्य प्रवेश द्वार स्थापित करने के लिए उपलब्ध नहीं है तो आप पद संख्या 1,2,3 अथवा 4 पर प्रवेश द्वार स्थापित कर सकते है। लेकिन कोशिश करिये कि इनमें 5 वां पद शामिल हो जाये। यदि आप पद संख्या1 का प्रयोग मुख्य द्वार स्थापित करने में कर रहे तो इस बात विशेष ध्यान रखें कि दरवाजे एवं उत्तर-पूर्वी कोने के बीच कुछ स्थान अवश्य हो जो कि लगभग कम से कम 6 इंच होना चाहिए।
• आप पद संख्या 6 एवं9 में भी प्रवेश द्वार स्थापित कर सकते है यदि अन्य कोई स्थान उपलब्ध नहीं है।
• वास्तु के अनुसार यह सर्वश्रेष्ठ है कि भूमि का ढलान दक्षिण दिशा से उत्तर दिशा की ओर हो।
• रसोई घर का निर्माण प्राथमिक रूप से दक्षिण-पूर्वी दिशा एवं वैकल्पिक रूप से उत्तर-पश्चिम दिशा में करना चाहिए। घर के मालिक का शयन कक्ष दक्षिण-पश्चिम दिशा होना चाहिए, अतिथि कक्ष उत्तर-पश्चिम दिशा में एवं पूजा कक्ष का निर्माण घर के पूर्वोत्तर कोने में किया जाना चाहिए।

उत्तर मुखी घर मे निम्नलिखित चीजो को करने से बचे :

• कभी भी उत्तर पूर्वी दिशा में शौचालय का निर्माण न करें।
• शयनकक्ष कभी भी पूर्वोत्तर कोने में नहीं हेाना चहिए।
• सेफ्टिक टैंक का निर्माण कभी भी उत्तर पूर्वी कोने में नहीं करना चाहिए।
• उत्तर दिशा के पद संख्या 1एवं 5 के बीच कभी भी सीढी का निर्माण नहीं करना चाहिए।
• रसोई घर का निर्माण उत्तर पूर्वी कोने में नहीं करना चाहिए क्योंकि रसोई अग्नि तत्व प्रतीक है जबकि उत्तर पूर्वी कोने को जल तत्व का प्रतीक माना जाता है।
• कभी भी ऐसा उत्तर मुखी भूमि न खरीदे जिसका ढलान उत्तर से दक्षिण दिशा की ओर हो। यदि संभव हो तो निर्माण से पूर्व ढलान को मिट्टी पाट कर पलटने का प्रयास करें जो कि दक्षिण से उत्तर दिशा की ओर होना चाहिए।
• घर के उत्तर दिशा की ओर बड़े पेड़ लगाने से बचे।
• घर के पूर्वोत्तर या उत्तरी कोने में गंदगी न फैलाये एवं कूड़ेदान की स्थापना न करें।

Vastu for West Facing House